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Thursday, July 12, 2012

यहां पूरा प्रशासन पेन्ट उतारकर बैठ गया है

रूपा अभी अमदावाद की सीवील अस्पताल में है


राजु सोलंकी

राजकोट के थोराला विस्तार में 25 जून को एक दलित युवान की हत्या के बाद दलितों पर हुए पुलिस दमन अखबारों में नहीं छपा.  सोलह साल की रूपा अपने घर की उपरी मंजिला पर खाना पका रही थी. पड़ोशी के घर के दरवाजे में छेद करके अंदर दाखिल हुई पुलिस छत से रूपा के घर में आई और उस पर लाठियों की बौछार कर दी. डर के मारे रूपा सीडी की तरफ भागी तो उसकी पीठ पर लात मारी, सीडी से गिरने से उसकी कमर तूट गई. रूपा का राजकोट की सीवील अस्पताल में इलाज नहीं हुआ, पुलिस के डर से केस फाईल में कमर टूटने का कारण भी नहीं लिखा गया।

30 जून 12 को हम राजकोट गये. रूपा के घर के आगे ही हम बैठे थे. रूपा के पिताजी को फरियाद करने के लिये समझाया. "मैंने सुबह अपने घर को 30,000 में गीरवी रख दिया है. मैं अपनी लड़की को प्राईवेट होस्पीटल में भर्ती करूंगा, फरियाद करूंगा तो पुलिसवालों मेरी हड्डियां तोड देंगे, मैं घर को ताला मार दूंगा," ये थे रूपा के पिता सवजीभाई के शब्द. "हम आपके ही समाज के हैं, इसलिये आपके प्रति भावना से प्रेरित होकर आये हैं, रूपा का ईलाज यहां ना हो सके तो अमदावाद ले आना," इससे ज्यादा सवजीकाका को हम कहे नहीं सके. दूसरे दिन बारह बजे रूपा के रिश्तेदार उसे अमदावाद लाये. उनके साथ जाकर रूपा को सीवील में भर्ती कराने के बाद लगातार हम उसके संर्पक में है. अभी उसे स्पाईन विभाग में भर्ती किया गया है. रूपा का ईलाज अच्छी तरह से हो उसके लिये हम सब कृतनिश्चयी है, परन्तु ये तो सचमुच आसमान फटा है. रूपा के घर के सामने रहते आंबेडकरनगर के ही 9 वर्षीय करण को अब ये भी याद नहीं होगा कि उसने कितनी बार जाहिर में अपनी पेन्ट उतारी होगी और लोगों को उसके गुप्तांग पर लगी चोट बताई होगी. "पुलिस ने मुझे पेशाब करने की जगह पर लात मारी," ऐसा कहते कहते वह अपनी माता से जिस तरह चीपक जाता है, उस दृश्य को देखकर ही पता चला जाता है कि उस पर क्या बीत रही होगी.

राजकोट मुलाकात के दौरान ही अनुसूचित जाति आयोग के राजु परमार लालबत्तीवाली गाडी में वहां आये थे. हमने उनसे फोन पर बात की. जब उन्हे करन के बारे में जानकारी दी तब उन्होने उसे कलेक्टर कचहरी पर लाने के लिये कहा. करन ने कलेक्टर कचहरी में सबके सामने पेन्ट उतारी. इस बार माता के आंचल से लिपटा नहीं, परन्तु मक्कमता से वहां खडा रहा. कलेक्टर त्रीवेदी, एसपी डॉ. राव के चहेरे पर शर्मिदगी दिखाई दे रही थी. आयोग ने कलेक्टर को एक्शन टेकन रिपोर्ट तैयार करने का आदेश दिया और पांच बजे की फ्लाइट पकडने के लिये फटाफट वहां से रवाना हुआ। एक मासुम बच्चा अपनी पेन्ट उतार रहा था, मगर उससे किसी को कोई फर्क नहीं पड रहा था, क्योंकि पूरा प्रशासन यहां कब से अपनी पेन्ट उतारकर बैठ गया है.

हम वापस आंबेडकरनगर आये. अभी ढेर सारी वितककथाएं हमारी राह देख रही थी. 42 वर्षीय प्रवीण नकुम को घर में घुसकर मारा, तीन दिन तक गेरकानून हिरासत में रखा, बाद में छोड दिया. उन्हें इतने भयंकर रूप से मारा था कि पांच दिन बाद हम जब उन्हें मिले उस वक्त भी उनके घाव नहीं भरे थे. उनके लड़के का बाल खींचकर घसीटती हुई पुलिस चौराहे तक ले गई और उसे भी जेल में बंद कर दिया. प्रवीणभाई की पत्नी के कान में पहेने हुए इयरिंग को इतनी जोर से पुलीस ने खिंचा कि वहां खरोच पड गई. उसकी खरोंच के निशान अभी भी उनके चहेरे पर मौजूद है. पांव के तलवे पर लक़डियो से इतना प्रहार किया गया कि तलवे सूज गए थे और सूजन काफी दिनों तक रही. सिर्फ लगोंछा पहनकर बैठे हुण प्रवीणभाई छूटक मजूरी करते है.

जन्म से टेढी गर्दन के साथ जन्मी भावना को लेकर उसके माता पिता हमारे पास लाये. "मेरी बच्ची को भी उन्होंने नहीं छोडा, धडाधड लाठियां बरसाने लगे उस पर," भावना की माता रोआसा चहेरा करते हुए कह रही थी. करन के बडे भाई मुकेश ने भी पट्टी किये पांव को दिखाते हुए कहा कि पुलिस ने उसे भी लाठी से मारा था. "पुलिस दीवार कुदकर हमारे घर में घुसी थी. मेरे दूसरे दो बडे बेटों को भी पकडकर ले गई है. मैं बहुत चिल्लाई, पर मेरी सुने कौन?" जयाबहेन की बात बिलकुल सच थी. सूने कौन?

25 जून को गुणवंत की हत्या हुई थी. यह "गुणा" थोराला के दलितों का हीरो था. दलितों में हर जगह ऐसे गुणाएं है. जेतलपुर का शकरा भी ऐसा ही बहादुर था। पंचायत की कचहरी में बंद करके पेटलों ने उसे युंही ही नहीं जलाया था. धाडा के रमेश को दरबारों ने गांव के बीचोबीच ट्रेक्टर के नीचे कुचल दिया. रमेश ने दरबारों के आंखो में आंखे डालने की हिम्मत की थी। हैदराबाद से मिलिट्री की तालीम लेकर घर वापस आये सायला तालुका के कराडी गांव के दलित युवान ने उसकी सात पीढियों में शायद पहेलीबार गांव के चोक में जुआ खेलते दरबारों को डांटने की "गुस्ताखी" की और उसके सीने को गोलियों से छलनी कर दिया गया. गुणा एन्टी-सोशियल था, बुटलेगर था. "परन्तु हमारे लिये दीवार जैसा था. गुणा जिंदा था, तब तक थोराला में पुलिस घुस नहीं सकती थी," थोराला के दलित अगर ऐसा कहते है तो इसमें कोई अतिशयोक्ति नहीं है.

बदनसीबी यह है कि गुणा को चाकू मारनेवाला हाथ इमरान का है. इमरान हितेश मुंधवा जैसे जम़ीन दलालों का प्यादा है यह सत्य थोराला के दलित अच्छी तरह जानते हैं, मगर अभी तो उनका क्रोध एक गरीब मुसलमान का घर जलाने में परीवर्तीत हुआ है. गुणा की स्मशानयात्रा में समूचे जीला के दलित आए थे और अग्निदाह के बाद सभी अस्सी फुट के रोड पर इकठ्ठा हुए थे. "उनके पास प्राणघातक हथियार थे और बार बार समजाने पर भी नहीं माने थे और गैरकानूनी मंडली रचकर पब्लीक प्रोपर्टी को नुकसान पहुंचाने के गंभीर प्रयास किए थे," ऐसे आरोप पुलीसने एफआईआर में दर्ज करके 54 लोगों को हिरासत में लिया और बाद में हुए पुलीस दमन को न्यायोचित ठहराने का प्रयास किया है.

पीछले कुछ सालों से राजकोट दलित अत्याचार का एपीसेन्टर बना है. हर साल चौदह अप्रैल को कुछ न कुछ बहाना निकालकर दलितों को पीटने की पेटर्न पुलीस ने बना ली है. 2011 में बाबासाहब की प्रतिमा का मुसलमानों द्वारा खंडन होने की अफवाह फैलाई गई थी, उसमें राजकोट बीजेपी के लघुमती सेल के अद्यक्ष कादर सलोट ने मुख्य भूमिका निभाई थी ऐसा सूत्रो ने बताया था. "हमने तूम्हारे बाप का पूतला नहीं तोडा," ऐसा बोलकर मालवीयानगर पुलीस स्टेशन के "दरबार" पुलीसवालों ने महात्मा गांधी छात्रावास के दलित छात्रों को बेरहेमी से पीटा था. उस दमन को हमने "मेरे बाप का पुतला" नाम की दस्तावेजी फिल्म में उजागर किया है. थोराला इसी दमन-चक्र की एक और कडी है.

थोराला के समाचार को द्विगुणित करती हूई एक और घटना हमारे सामने हूई. डबल ग्रेज्युएट, सफाई कर्मी अशोक चावडा ने राजकोट के सीटी इजनेरी विभाग के अफसरों के तथाकथित मानसिक त्रास से व्यथित होकर अमदावाद की होटल में आकर आत्महत्या की. अशोक चावडा की स्युसाइड नोट होटल के उस कमरे से पुलीस को मीली है. इसी समय के दौरान सुरेन्द्रनगर जीला के वढवाण तालुका के वडला गांव में दलित सरपंच पर जानलेवा हमला होने की खबर भी मीली. 2013 विधानसभा का आनेवाला चुनाव रक्तरंजित होगा ऐसा राजकीय निरीक्षकों का कहेना है. दलितों का हर दिन रक्तरंजित है और रात शोक की कालीमा ओढ़कर सोती है.

(30 जून 2012. थोराला की मुलाकात लेने गई सीवील सोसायटी की टीम में थे रफी मलेक, प्रसाद चाको, होझेफा उज्जैनी, अशोक परमार, भानुबहेन परमार, कीरीट परमार, डॉ. जयंती माकडीया, वृंदा त्रिवेदी तथा राजु सोलंकी) 

Thursday, April 5, 2012

दलित-मुसलमान को लडाने की साजिश


 वह प्रतिमा जिसे
तोडने की  अफवाह फैलाई गई
इस साल चौदह अप्रैल को गुजरात के किसी शहर में डॉ. बाबासाहब अंबेडकर की प्रतिमा का खंडन हुआ है ऐसा कोई रीपोर्ट आपको मिले और यह काम मुसलमानो ने किया है ऐसा उस रीपोर्ट में उल्लेख हो तो, हमें याद करना. हो सकता है कि ऐसी कोई घटना हुई ही ना हो. बीजेपी के सेफ्रन षडयंत्रकारियों की दलित और मुसलमान को लडाने की यह एक नई साज़िश भी हो सकती है. हम ऐसा दावे के साथ कह सकते है, क्योंकि पीछले साल सचमुच ऐसा षडयंत्र गुजरात के राजकोट शहर में गढ़ा गया था और उसे पुलीस की मदद से बखूबी अंजाम दिया गया था.

दलित अपने घरों को ताला लगाकर नीकल गए
हिन्दु राष्ट्र की पुलीस पीछे जो पडी थी
2011 की उस चौदह एप्रैल के दिन राजकोट शहर के गांधी वसाहत विस्तार में बाबासाहब की प्रतिमा का खंडन हुआ है और मुसलमानों ने ऐसा घिनौना काम किया है, ऐसी एक भयानक अफवाह फैलाई गई थी. यह अफवा किसने फैलाई यह तो किसी को मालूम नहीं था, मगर उसके बाद कुछ ही मिनटों में प्रतिमा के आसपास के क्षेत्र में रहते दलितों और मुसलमानों के बीच दंगा शरू हो गया.


घटना के पंद्रह दिनों के बाद भी ऐसी हालत थी 
पुलीस ने आकर दलितों को पीटा, सीपीसी की विविध धाराओं तहत कुल पांच एफआईआर दर्ज की और दलितों तथा मुसलमानों दोनों समुदायों के लोगों को लोकअप में डाल दिया. एक जगह पर चार-पांच दलितों की टोली पथराव करने नीकली थी तब कैसे पूरी इलेक्ट्रोनिक मीडीया की फौज उधर पहुंच गई और बार बार दंगाई दलितों के क्लिपिंग्स टीवी पर आने लगे. कुछ देर के बाद शहर की पुलीस कमिशनर गीता जौहरी उस जगह पहुंची और उसने उस तथाकथित प्रतिमा को वापस अपनी जगह पर रख दिया!

विपुल गोहील (14 वर्ष)

हमने ता. 30 अप्रैल को घटना स्थल की तहेकीकात की. प्रतिमा वहीं की वहीं है. उसे जरा सा भी नुकसान नहीं हुआ था. अगर कोई सचमुच इस प्रतिमा को हाथ से या कीसी चीज से गीरा देता है तो जरूर उसे क्षति पहुंचती. लगता था किसीने जानबूझकर प्रतिमा को संभालकर जमीन पर रख दिया था और अफवा फैलाई थी. दलितों को जो नुकसान होना था हो चुका था. उसी दिन घटना स्थल से पांच किलोमीटर की दूरी पर स्थित महात्मा गांधी होस्टेल के दलित विद्यार्थीओं के साथ जो हुआ उससे षडयंत्र की बात को और पुष्टि मीलती है.

राहुल राठोड, पुलीस के समन्स अभी
भी उसका पीछा नहीं छोडते
होस्टेल के विद्यार्थियों ने जब प्रतिमा खंडन के बारे में सूना तो, कुछ विद्यार्थीओं ने होस्टेल के दरवाजे पर विरोध प्रदर्शन किया. थोडी देर में वहां आ पहुंची मालवियानगर की पुलीस चार मजले की उस होस्टेल में घुसकर,  विद्यार्थियों के कमरों के दरवाजे तोडकर, गालियां देकर, सबको बाहर निकालकर, मारते हुए पुलीस स्टेशन ले गई. हम जब होस्टेल में उन  विद्यार्थियों  से मीले तब वे परीक्षा की तैयारियां कर रहे थे. उन्होनें हमें बताया कि किस तरह से पुलीसने जुल्म किया.


संजय काथड, एम.ए. पार्ट टु की तैयारी
कर रहा था, और पुलीस तूट पडी 
पुलीस मारते वक्त गालियों की बौछार करती हुई कह रही थी, "हमने तूम्हारे बाप का पूतला नहीं तोडा है.......वहां गांव में तूम्हारा बाप चमडा मसल रहा है...." पुलीस जब विद्यार्थीओं को मार रही थी तब होस्टेल के दरवाजे पर सारे मीडीयावाले इकठठा हो गए थे, लेकिन किसी को पुलीस ने होस्टेल में जाने नहीं दिया था.


दिलीप मकवाणा, पुलीस ने इतनी बेरहेमी से मारा कि
चलने के काबिल भी नहीं रहा 
विद्यार्थियों को पुलीस  मालवियानगर पुलीस स्टेशन ले गई और उनको पूछा कि किस किस को चोट लगी है. जब कुछ विद्यार्थीओं ने अपनी चोट के बारे में बताया तो उन्हे सरकारी अस्पताल में चिकित्सा के लिए भेजा गया और उन सभी के खिलाफ एफआईआर दर्ज की गई. सरकारी अस्पताल में विद्यार्थीओं ने अपनी चोटों के बारे में जो कुछ बी बताया, वह सारे तथ्य एमएलसी के दाक्तरी सर्टिफिकेटों में मौजुद है. चुंकी होस्टेल सरकारी है, इस लिए होस्टेल के गृहपति ने सरकार के समाज कल्याण विभाग को कम्प्लेइन करके सारी बातें बताई थी, फिर भी कोई भी कदम उठाया गया नहीं था.

मुसलमान औरतों ने बताया कि दंगे में किसी को कुछ
नुकसान नहीं हुआ, प्रतिमा खंडन के बारे में मालुम नहीं
हम बाद में प्रतिमावाले क्षेत्र गांधी वसाहत में गए थे और मुसलमान महिलाओं से मिले थे. उन्होने बताया था कि किसीको भी उस दिन दंगे में कोई नुकसान नहीं हुआ था. लेकिन दलितों में अबी भी पुलीस का आंतक बना हुआ था और लोग अपने घरों को ताला लगाकर भाग निकले थे. गुजरात में दलितों को हिन्दुत्व के पाठ शीखाने का नरेन्द्र मोदी का यह एक ऐसा तरीका है, जिसके बारे में अभी भी दलितों की आंखें खुली नहीं है.


शायद हिन्दुत्ववादियों को यही बात चूभती है .....
इस क्षेत्र में दलित और मुसलमान के बीच कैसा सदभाव था, इसका बहुत अच्छा उदाहरण हमें देखने को मिला. बाबासाहब की प्रतिमा के ठीक सामने गोविंदभाई अघोरा नाम के दलित के घर पर लगाई हूई तक्ती पे लिखा है, 'निगाहे करम' और उसके साथ कुराने शरीफ का चित्र भी है. दलितों और मुसलमानों के बीच कैसा सौहार्द है इसका इससे बडा प्रमाण आपको कहीं भी नहीं मिलेगा. शायद हिन्दु कट्टरपंथियों को यही बात चूभती होगी, जिसे नष्ट करने के लिए प्रतिमा खंडन की अफवाह फैलाई गई थी.