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Tuesday, June 12, 2012

दलित शब्द क्यों?


'दलित' शब्द से हमारे कुछ विद्वान दोस्तों को एतराज है. वे कहते हैं कि बाबासाहब ने कभी भी 'दलित' शब्द का इस्तेमाल नहीं किया था. हकीकत यह है कि बाबासाहब ने ही सब से पहले यह शब्द का उपयोग किया था, अंग्रेजी में डीप्रेस्ड क्लासीस (दलित वर्गों) के रूप में. 1936 में जब बाबासाहब को लाहोर के जात पात तोडक मंडल ने न्यौता दिया था, तब मंडल के हर भगवान को पत्र लिखते हुए बाबासहब कहते हैं, "I feel bound to ask; did you think that in agreeing to preside over your conference, I would be agreeing to suspend or to give up my views regarding  change of faith by the depressed classes?" (अर्थात, मैं आप को पूछना चाहुंगा कि आप की परीषद का अध्यक्ष बनने की संमति दे कर मैं दलित वर्गों द्वारा धर्मांतर करने के बारे में मेरे जो भी मंतव्य हैं उन्हे स्थगित कर दुंगा या छोड दुंगा, ऐसा आप मानते थे?)

यह शब्द कई बार बाबासाहब द्वाया उपयोग में लिया गया है. अनुसूचित जाति शब्द प्रारंभ में नहीं था. यह शब्द 'स्टेट्स एन्ड माइनोरिटीझ' में देखने को मिला, जब उन्हो ने देश का संविधान का एक प्रारूप दिया था. बौद्ध धर्मपरीवर्तन के साथ बाबासाहब हमें 'बौद्ध' संज्ञा देते हैं. दलित से अनुसूचित जाति और अनुसूचित जाति से बौद्ध. यह सफर एक रात में बाबासाहब ने तय नहीं की थी. इसी लिए कांसीरामजी ने भी पहले सामाजिक संगठन 'दलित-शोषित समाज सुरक्षा समिति' (डीएस फोर) का गठन किया था. कांसीरामजी बेवकूफ नहीं थे.    

Thursday, June 7, 2012

हरीजनों के पास दिमाग नहीं है, बुद्धि नहीं है, ऐसा कहते है गांधी



"मैं मानता हुं कि ............. हरीजनों का विशाल समुदाय तथा उसी तराह भारतीय मनुष्य ख्रिस्ती धर्म की प्रस्तुती समज नहीं सकते और सामान्य तौर पर जहां भी धर्मांतर होता है, वह किसी भी अर्थ में आध्यात्मिक कृत्य नहीं है. (हरीजन, 1936, पेज 140-141). वे (हरीजन) दो चीजों के बीच फर्क नहीं कर सकते, जितना की एक गाय कर सकती है. हरीजनों के पास दिमाग नहीं है, बुद्धि नहीं है, इश्वर और अनिश्वर के बीच फर्क करने की समजशक्ति नहीं है." (हरीजन, 1936, पेज 360)

(डॉ. बाबासाहेब अंबेडकर, राइटींग एन्ड स्पीचीज़, वोल्युम 5, अनपब्लिस्ड राइटींग्स, अनटचेबल्स ओर धी चील्ड्रन ऑफ इन्डीयाझ गेट्टो एन्ड अधर एसेझ ओन अनटचेबल्स एन्ड अनटचेबिलिटी सोशीयो-पोलीटीकल-रीलीज्यस, पेज 446-450)

Sunday, April 15, 2012

बाबासाहब को संविधानसभा में किसने भेजा - बेचारे मोदी को क्या पता


प्राचीनकाल में जिन्हे चांडाल के नाम से बुलाया
जाता था, वही नामशुद्र जाति के सदश्य का यह
चित्र 1860 का है. बाबासाहब को संविधानसभा
में भेजनेवाली यह जाति का इतिहास हम भूल
जाएंगे तो हमें हमारी भावी पीढियां माफ नहीं करेगी


'सामाजिक समरसता' के प्रकरण 'डॉ. बाबासाहब अंबेडकर: क्रान्तिकारी समाजपुरुष' में संघ के कट्टर प्रचारक मोदी इतिहास को तोडमरोड के रखने का सीलसीला जारी रखते हुए आगे लिखते हैं, "उस समय (मतलब आज़ादी के आंदोलन के दौरान) समूची कांग्रेस बाबासाहब अंबेडकर के खिलाफ थी. अंबेडकरवादी होने का अर्थ गुनहगार होना ऐसा उस समय का माहौल था. कांग्रेस का संपूर्ण संघर्ष अंबेडकरवादी लोगों के सामने था. देश पर कांग्रेस का झंडा लहराता था और देश में बाबासाहब अंबेडकर के बारे में लोग को ज्यादा पता न चले ऐसी कवायत योजनाबद्ध तरीके से हुई थी."

श्रीमान मोदी की इस बात को इतिहास की सच्चाई के संदर्भ में जरा देख लें. आज़ादी के संग्राम में समूची कांग्रेस बाबासाहब के खिलाफ थी, यह बात तो सही है. मगर वह कांग्रेस गांधी-सरदार-नेहरु की थी. देश में कांग्रेस के समग्र संगठन पर सरदार वल्लभभाई पटेल का प्रभुत्व था. और उन्ही के कहने से बाबासाहब को संविधान सभा में जाने से रोका गया था, और योजनाबद्ध तरीके से उनको महाराष्ट्र में चुनाव में हराया गया था. बाद में जोगेन्द्रनाथ मंडल जैसे दलित नेता, जो पूर्व पाकिस्तान (आज के बांग्लादेश) में मुस्लीम लीग के साथ थे, उनकी सहायता से बाबासाहब देश की संविधान सभा में गए थे. जोगेन्द्रनाथ मंडल ने बाबासाहब को समर्थन देकर कांग्रेस और सरदार वल्लभभाई पटेल की साज़िश नाकाम की थी.

बाबासाहब को (और उस वक्त कुछ समय के लिए मुस्लीम लीग को) समर्थन देने का दु:साहस करनेवाले मंडल की जाति नामशुद्र के समूचे क्षेत्र, हालांकि वह हिन्दु-बहुल क्षेत्र था, को सजा के तौर पर विभाजन के दौरान भारत से अलग करके (पूर्व) पाकिस्तान को सौंप दिया गया था. 1947 के बाद शुरु हुए सांप्रदायिक पागलपन में (पूर्व) पाकिस्तान के दलितों के साथ वहां के मुसलमानों ने नाइन्साफी की, दलित-विरोधी दंगों के बाद बीस लाख से ज्यादा दलित शरणार्थी होकर भारत में (अर्थात पश्चिम बंगाल) में आए. सीपीएम के बम्मन कम्युनिस्टो नें भी इन दलित शरणार्थीओ के प्रति कोई सहानूभूति नहीं दिखाई थी.

दलितों का इतिहास इस तरह से रक्तरंजित है और दिल को दहेलानेवाला है. संघ के प्रचारक इस तथ्यों को तोड मरोड कर रखते हैं, मगर हम इसे भूल नहीं सकते. नामशुद्र जाति आज भी जिंदा है. अपना पुराना कलंकित नाम नामशुद्र छोडकर नया गौरवान्वि नाम 'नामसेज' उन्होने अपनाया है. उनकी एक वेबसाइट नामशुद्र डोट कोम भी है, आप उसे अवश्य देखें.


Thursday, April 5, 2012

दलित-मुसलमान को लडाने की साजिश


 वह प्रतिमा जिसे
तोडने की  अफवाह फैलाई गई
इस साल चौदह अप्रैल को गुजरात के किसी शहर में डॉ. बाबासाहब अंबेडकर की प्रतिमा का खंडन हुआ है ऐसा कोई रीपोर्ट आपको मिले और यह काम मुसलमानो ने किया है ऐसा उस रीपोर्ट में उल्लेख हो तो, हमें याद करना. हो सकता है कि ऐसी कोई घटना हुई ही ना हो. बीजेपी के सेफ्रन षडयंत्रकारियों की दलित और मुसलमान को लडाने की यह एक नई साज़िश भी हो सकती है. हम ऐसा दावे के साथ कह सकते है, क्योंकि पीछले साल सचमुच ऐसा षडयंत्र गुजरात के राजकोट शहर में गढ़ा गया था और उसे पुलीस की मदद से बखूबी अंजाम दिया गया था.

दलित अपने घरों को ताला लगाकर नीकल गए
हिन्दु राष्ट्र की पुलीस पीछे जो पडी थी
2011 की उस चौदह एप्रैल के दिन राजकोट शहर के गांधी वसाहत विस्तार में बाबासाहब की प्रतिमा का खंडन हुआ है और मुसलमानों ने ऐसा घिनौना काम किया है, ऐसी एक भयानक अफवाह फैलाई गई थी. यह अफवा किसने फैलाई यह तो किसी को मालूम नहीं था, मगर उसके बाद कुछ ही मिनटों में प्रतिमा के आसपास के क्षेत्र में रहते दलितों और मुसलमानों के बीच दंगा शरू हो गया.


घटना के पंद्रह दिनों के बाद भी ऐसी हालत थी 
पुलीस ने आकर दलितों को पीटा, सीपीसी की विविध धाराओं तहत कुल पांच एफआईआर दर्ज की और दलितों तथा मुसलमानों दोनों समुदायों के लोगों को लोकअप में डाल दिया. एक जगह पर चार-पांच दलितों की टोली पथराव करने नीकली थी तब कैसे पूरी इलेक्ट्रोनिक मीडीया की फौज उधर पहुंच गई और बार बार दंगाई दलितों के क्लिपिंग्स टीवी पर आने लगे. कुछ देर के बाद शहर की पुलीस कमिशनर गीता जौहरी उस जगह पहुंची और उसने उस तथाकथित प्रतिमा को वापस अपनी जगह पर रख दिया!

विपुल गोहील (14 वर्ष)

हमने ता. 30 अप्रैल को घटना स्थल की तहेकीकात की. प्रतिमा वहीं की वहीं है. उसे जरा सा भी नुकसान नहीं हुआ था. अगर कोई सचमुच इस प्रतिमा को हाथ से या कीसी चीज से गीरा देता है तो जरूर उसे क्षति पहुंचती. लगता था किसीने जानबूझकर प्रतिमा को संभालकर जमीन पर रख दिया था और अफवा फैलाई थी. दलितों को जो नुकसान होना था हो चुका था. उसी दिन घटना स्थल से पांच किलोमीटर की दूरी पर स्थित महात्मा गांधी होस्टेल के दलित विद्यार्थीओं के साथ जो हुआ उससे षडयंत्र की बात को और पुष्टि मीलती है.

राहुल राठोड, पुलीस के समन्स अभी
भी उसका पीछा नहीं छोडते
होस्टेल के विद्यार्थियों ने जब प्रतिमा खंडन के बारे में सूना तो, कुछ विद्यार्थीओं ने होस्टेल के दरवाजे पर विरोध प्रदर्शन किया. थोडी देर में वहां आ पहुंची मालवियानगर की पुलीस चार मजले की उस होस्टेल में घुसकर,  विद्यार्थियों के कमरों के दरवाजे तोडकर, गालियां देकर, सबको बाहर निकालकर, मारते हुए पुलीस स्टेशन ले गई. हम जब होस्टेल में उन  विद्यार्थियों  से मीले तब वे परीक्षा की तैयारियां कर रहे थे. उन्होनें हमें बताया कि किस तरह से पुलीसने जुल्म किया.


संजय काथड, एम.ए. पार्ट टु की तैयारी
कर रहा था, और पुलीस तूट पडी 
पुलीस मारते वक्त गालियों की बौछार करती हुई कह रही थी, "हमने तूम्हारे बाप का पूतला नहीं तोडा है.......वहां गांव में तूम्हारा बाप चमडा मसल रहा है...." पुलीस जब विद्यार्थीओं को मार रही थी तब होस्टेल के दरवाजे पर सारे मीडीयावाले इकठठा हो गए थे, लेकिन किसी को पुलीस ने होस्टेल में जाने नहीं दिया था.


दिलीप मकवाणा, पुलीस ने इतनी बेरहेमी से मारा कि
चलने के काबिल भी नहीं रहा 
विद्यार्थियों को पुलीस  मालवियानगर पुलीस स्टेशन ले गई और उनको पूछा कि किस किस को चोट लगी है. जब कुछ विद्यार्थीओं ने अपनी चोट के बारे में बताया तो उन्हे सरकारी अस्पताल में चिकित्सा के लिए भेजा गया और उन सभी के खिलाफ एफआईआर दर्ज की गई. सरकारी अस्पताल में विद्यार्थीओं ने अपनी चोटों के बारे में जो कुछ बी बताया, वह सारे तथ्य एमएलसी के दाक्तरी सर्टिफिकेटों में मौजुद है. चुंकी होस्टेल सरकारी है, इस लिए होस्टेल के गृहपति ने सरकार के समाज कल्याण विभाग को कम्प्लेइन करके सारी बातें बताई थी, फिर भी कोई भी कदम उठाया गया नहीं था.

मुसलमान औरतों ने बताया कि दंगे में किसी को कुछ
नुकसान नहीं हुआ, प्रतिमा खंडन के बारे में मालुम नहीं
हम बाद में प्रतिमावाले क्षेत्र गांधी वसाहत में गए थे और मुसलमान महिलाओं से मिले थे. उन्होने बताया था कि किसीको भी उस दिन दंगे में कोई नुकसान नहीं हुआ था. लेकिन दलितों में अबी भी पुलीस का आंतक बना हुआ था और लोग अपने घरों को ताला लगाकर भाग निकले थे. गुजरात में दलितों को हिन्दुत्व के पाठ शीखाने का नरेन्द्र मोदी का यह एक ऐसा तरीका है, जिसके बारे में अभी भी दलितों की आंखें खुली नहीं है.


शायद हिन्दुत्ववादियों को यही बात चूभती है .....
इस क्षेत्र में दलित और मुसलमान के बीच कैसा सदभाव था, इसका बहुत अच्छा उदाहरण हमें देखने को मिला. बाबासाहब की प्रतिमा के ठीक सामने गोविंदभाई अघोरा नाम के दलित के घर पर लगाई हूई तक्ती पे लिखा है, 'निगाहे करम' और उसके साथ कुराने शरीफ का चित्र भी है. दलितों और मुसलमानों के बीच कैसा सौहार्द है इसका इससे बडा प्रमाण आपको कहीं भी नहीं मिलेगा. शायद हिन्दु कट्टरपंथियों को यही बात चूभती होगी, जिसे नष्ट करने के लिए प्रतिमा खंडन की अफवाह फैलाई गई थी.